Wednesday, September 22, 2010

क्या लिखू सोचता ही रहा .......

आज  कुछ  लिखने  को  मन हुआ पर
क्या लिखू सोचता ही रहा .......

एक  बार ख्याल आया नेताओ पर लिखू
उनके काले चिठ्ठो  पर हाथ साफ़ करू
पर बेचारी कलम ने लिखने से किया इनकार
करने लगी मुझसे  मिन्नतें कई हज़ार
 बोली एसो पर क्या लिखू जिनका धर्म ईमान नहीं
जिन्हें अपने देश अपनी जनता की परवाह नहीं
बात सच थी कलम की उसे तोलता ही रहा
क्या लिखू सोचता ही रहा ............

फिर ख्याल आया बचपन की बात लिखू
पुरानी बातो को याद कर  हर जज्बात लिखू
जैसे ही उठाई कलम बोली मुझे , भूल गए
पिछले हफ्ते ही मुझसे लिखवाई हैं
पूरी रात स्याही की जगह मैंने अश्क ही बहाई हैं
फिर वही प्रशन उठ खड़ा हुआ
क्या लिखू सोचता ही रहा.......

लिखू ऐसी कविता जो हर किसी के  मन की बात हो
जिसमे न कोई विवाद न ईर्ष्या न द्वेष की बात हो
जिसे पढ़कर हर मन कुछ कर गुजरने की सोचे
नई विकास की सोचे समृद्ध संसार की सोचे
जिसमे प्यार की चांदनी भरी हो
जिससे  लिख कर मेरी कलम भी खुश बड़ी हो
पूरी रात पुरे दिन नए नए विषय खोजता ही रहा
क्या लिखू सोचता ही रहा ........

Saturday, September 18, 2010

एक दिन एक गाँव

भारत में शहर और गाँव दोनों अपना अपना महत्त्व रखते हैं . शहर अपनी भव्यता के लिए और गाँव अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं . जहाँ शहरों में अपनत्व ख़त्म होता जा रहा हैं वहां गाँव आज भी अपनी महेमान नवाजी की परंपरा बनाये रखे हैं ....


एक ऐसे ही गाँव में मैंने एक दिन गुजारा. पुणे से ३० किमी दूर उरली कांचन क़स्बा पड़ता हैं . उरली से ५ किमी दुरी पर हैं एक गाँव शिन्द वणे. शिन्द वणे में एक दिन कैसा था . यही कहानी लेके आया हूँ .
सबसे पहली बात वह जाने का कार्यक्रम बना कैसे . मेरे मामाजी के ऑफिस का ऑफिसबॉय गणेश . उसकी वजह से वहां जाने का मौका मिला . गणेश का गाँव "शिन्द वणे " . उसके गाँव में उर्स (मेला) था .उसके कारन उसने ऑफिस २ दिन की छुट्टी ली थी . और उसने मामाजी से मुझे अपने गाँव साथ में भेजने को मना लिया .


सन्डे १६ अप्रैल, २००६


गणेश २:३० दोपहर में लेने आया . मैं और शिंतू (मौसेरा भाई ) दोनों ही जाने के लिए बैठे थे. घर से उरली कांचन की यात्रा पुणे की सिटी बस से की . उरली कांचन पहुँच कर थोडा बहुत नाश्ता किया . वहां से आगे की यात्रा हमको जीप से करनी थी . ६:०० शाम तक हम गाँव पहुंचे . शिन्द वने में गणेश के गार जा कर थोड़ी देर आराम किया ..उसके बाद गाँव देखने निकले.
पूरा गाँव उरली ससवाद रोड पर बसा हैं . गाँव के दक्षिण दिशा में बड़े विशाल पहाड़ थे . जहा भी देखो कोई न कोई छोटा बड़ा पहाड़ दिखाई दे जाता था . शाम हो चली थी और मस्त हवा भी बहाने लगी थी .
घर पहुँच कर गणेश की माता जी से मुलाकात हुई . लेकिन माता जी हिंदी नहीं बोल पाती थी. केवल मराठी ही आती थी. गणेश को माता जी ने कुछ काम करने को कहा .तक तक हम दोनों भाइयो ने आराम किया .
९:30 बजे हम ने खाना खाया . थोडा आराम करने के बाद हम वहां चल दिए जहाँ उर्स लगा था. ........




वहां  एक stage लगा था उस पर गाँव के कुछ महत्वपूर्ण  व्यक्ति बैठे थे . stage के आगे काफी जगह खली राखी गई थी. एक तरफ महिलाये तो दूसरी तरफ पुरुष बैठे थे हमने भी जगह ले ली. 
कार्यक्रम शुरू हुआ. वहां अलग अलग ग्रुप में लड़के प्रोग्राम देने लगे. कुछ कुछ पीटी जैसा ही क़र रहे थे. ढोल नगारे झाझर से वहां का वातावरण गूंजने लगा. मुझे उनका कार्यक्रम बहुत अच्छा  लगा . वे ग्रुप अलग अलग गाँवों से थे . जैसे ही वे अपना प्रोग्राम देते जाते लोग stage पर माइक लिए  व्यक्ति को अपनी इक्छा  अनुसार रुपये दे जाते . और वो माइक वाला व्यक्ति रुपये देने वाले सज्जन का नाम बोलता. जैसे ही एक ग्रुप का कार्यक्रम ख़त्म होता...वह व्यक्ति इकठ्ठे हुवे रुपये और एक नारियल उनके ग्रुप लीडर को देता और लीडर के माथे पर गुलाल लगा देता  ..इसी प्रकार सब ग्रुप अपना कार्यक्रम देते और इनाम लेके जाते . अंत के २ ग्रुप उसी गाँव के लडको के थे एक ग्रुप में बड़े लड़के और दुसरे ग्रुप में छोटे बच्चे जो प्रिमरी स्कूल के थे. 
बड़े लडको का प्रोग्राम बहुत  अच्छा था . लडको ने काफी महेनत की थी . काफी देर तक अपनी performance देते रहे  .  इस ग्रुप को १५०० रुपये मिले . फिर छोटे बच्चो की बारी आई. अभी बच्चो ने कार्यक्रम शुरू ही नहीं किया था के लोगो ने रुपये जमा कराना  शुरू क़र दिया. पुरे ४००० रुपये जमा हुवे . १०० रुपये से नीचे किसी भी व्यक्ति ने नहीं दिया. लोगों ने दिल खोल क़र चंदा दिया . कारण था वो स्कूल primary  था . उस स्कूल को मान्यता प्राप्त  नहीं था , गाँव के लोग ही उस स्कूल को चलते थे . जितने रुपये जमा हुवे थे स्कूल के विकास में लगाया जायेगा .
इसके बाद stage खाली क़र दिया गया क्युकी अब वहां एक नाटिका, जिसे भारुड कहा जाता हैं , की त्यारिया होने लगी. पूरा नाटक मराठी में खेला जाने वाला था . जब तक भारुड की त्यारियां चल रही थी तब तक वहां लोगों ने भजन गाना शुरु क़र दिया . आधे घंटे  बाद भारुड शुरू हुआ . भारुड में खेला जाने वाला नाटक एक सत्य घटना पर आधारित  था .सतारा जिले में घटित यह घटना एक प्रेम कहानी थी . हालाकि नाटक पूरी रात चलने वाला था पर हमने १० मिनिट ही देखा और वापिश आ गए . 
गणेश ने हमारे सोने की व्यवस्था एक फार्म हाउस पर की . फार्म हाउस गणेश के घर से १ किमी दूर था हम वह पैदल ही गए .रात का समय था तो ठीक से कुछ दिखा नहीं .पर एक बात याद हिं काफी अच्छी हवा बह रही थी ......उस ठंडी  ठंडी हवा में कब नींद आ गई पता नहीं चला. अगले दिन सुबह जल्दी ही पुणे के लिए रवाना हो गए...

आज भी वो मेला याद आ जाता हैं ...गणेश की माता जी ने जो पकवान बनाये थे उन की खुसबू याद आ जाती हैं वो कार्यक्रम  याद आ जाता हैं ..भारुड याद आ जाता हैं .. फार्म हाउस की ठंडी ठंडी हवा याद आ जाती हैं ......... 

Friday, September 17, 2010

जब मैं छोटा बच्चा था........


बात उन दिनों की हैं
जब मैं छोटा बच्चा था........

हर बात नई नई सी लगती थी
तब मुझे मेरी दादी भी परी सी लगती थी
उसकी कहानियों वाली रानी बिलकुल
मेरी सफ़ेद बालो वाली दादी लगती थी
सब की डांट से वो बचाती थी
अपने हिस्से का भी मुझे खिलाती थी
वो भी क्या दिन थे बस जन्नत सा लगता था
जब मैं छोटा बच्चा था..............

गर्मियों की छुटिया जब आती थी
मुझे मेरी दादी से दूर ले जाती थी
पर जहाँ मैं जाता था
वो भी जन्नत ही लगता था
एक और बुढिया जो मुझे हसीं लगती थी
मेरी नानी; मेरी माँ की माँ कहलाती थी
मेरी नानी मेरी दादी की ही तरह थी
न कोई किसी से कम न कोई ज्यादा थी
मेरा बचपन दोनों परियो में झूलता था
जब मैं छोटा बच्चा था.............

आज जब मैं बड़ा हो गया हूँ
उन पुराने दिनों में खो गया हूँ
उन दोनों परियो में से एक परी खो गई हैं
मेरी दादी मुझसे रूठकर एक गहरी नींद में सो गई हैं
आवाज लगता हूँ उसे पर वो कुछ नहीं बोलती हैं
उस तस्वीर में ; जो लगी हैं दीवार पर, बस मुस्कुराती हैं

काश वो वक़्त वही रुक जाता
जब मैं छोटा बच्चा था ............

Thursday, September 9, 2010

क्योकि मैं बेरोजगार जो था

आज दिल कुछ परेशां सा था.
क्योकि मैं बेरोजगार जो था

वो दोस्त जो कहते थे रहेगे साथ सदा
अब वो भी कतराने लगे हैं
मुझे देखकर अपना रास्ता बदलकर
छुप जाने लगे हैं
उन सब के लिए अब मैं बेकार जो था
क्योकि मैं बेरोजगार जो था ........

घर में जो आता हूँ दिल डरता रहता हैं
माँ बाप से नज़र कैसे मिलुगा सोचता रहता हूँ
मुह से कुछ कहते नहीं मगर आँखे पूछती हैं
आज मिली होगी नौकरी सोचती हैं
मुझे परेशां देखकर परेशां होते हैं
उनका अपना था मैं प्यार जो था
क्योकि मैं बेरोजगार जो था ..........

कमरे की दीवारे मुझसे कहती हैं
क्यों उदास पड़ा है बाहर निकल
देख दुनिया बहुत बड़ी हैं
अपने पर भरोसा रख
तेरी जरुरत कहीं पर किसी को बड़ी हैं
फिर उठा लेता हूँ फाइल
चंद रुपये, जो माँ ने राशन के लिए बचा के रखे थे
और निकल पड़ता हूँ फिर दिन भर के लम्बे सफ़र पर
अपनी किस्मत को आजमाने
क्योकि मुझे अपनी किस्मत एतबार जो था
क्योकि मैं बेरोजगार जो था

Friday, September 3, 2010

छोटी सी जिन्दगी में बहुत काम बाकी हैं

छोटी सी जिन्दगी में बहुत काम बाकी हैं
मुसीबत -इ -मुफलिसी से इंतकाम बाकी हैं

इब्तेदा तो अच्छी हुई नज़रो से नज़ारे मिली उनसे
राह -इ -उल्फत में अभी कई मुकाम बाकी हैं

मदभरी आँखों ने पिला दी सारी महफ़िल को
कौन कहता हैं के महफ़िल -इ -दौर -इ -जाम बाकी हैं

अपनी रूह के टुकड़े कर चूका हैं "कँवल  "
देख लो देखने वालो फिर न कहना अंजाम बाकी हैं