Saturday, July 30, 2011

महगाई में बच्चों को क्या खिलाया जाये

महगाई में बच्चों को क्या खिलाया जाये 
चलो इस बार खेतो में हल चलाया जाये 

सुना हैं अगर एक पढ़े तो सौ पढ़ते हैं 
क्यों न  इक गरीब बच्ची को पढाया जाये 

उतर गया दुल्हन के मुख से श्रृंगार   
धरती को हरा भरा फिर से बनाया जाये 

आज के हालात में फिर सख्त  जरुरत हैं 
बापू को, उस गाँधी को दिल से बुलाया जाये 

पेट भरता नहीं "कँवल" अब शायरी से इसीलिए 
इस कलम उस डायरी को कहीं छुपाया जाये 

Saturday, July 23, 2011

चेहरे पर जुल्फ


अपने  चेहरे  पर  जुल्फ  का  पर्दा  गिराए  हुवे
जैसे  चाँद  को  बादलो  से  छुपाये  हुवे ...

मेरे  ख्याल  अब  मेरा  साथ  नहीं  देते
बहुत  दिन  हुवे   कलम  उठाये   हुवे

मसरूफ  जिन्दगी  में  कौन  खबर  रखता  है
कितने  दिन  हुवे  पडोसी  ने  चूल्हा  जलाये  हुवे

फूल  सा  चेहरा  "कँवल "गुस्से  में  लाल  लाल
मना रहा  हूँ   हाथ  कानो  पे  लगये  हुवे 

Friday, June 10, 2011

उसकी याद रात भर सताती रही
दिल में जज्बातों की लहरे आती रही 


अब बाबस्ता हो गए हैं अंधेरो  से भी 
चाँद की चांदनी भी तो दिल जलाती रही 


कोई रहता नहीं उसके  साथ इसलिए  
वो बुढ़िया दीवारों से उमरभर बतियाती रही 


टुटा घर फटे कपडे खाने को दाना नहीं 
जिंदगी गरीब पर कोड़े बरसाती रही 


हर एक मुकाम पर रूककर देखा "कँवल"
मंजिले  हसरत आवाज दे दे कर बुलाती रही 
अरविन्द मिश्र "कँवल" 

Thursday, May 26, 2011

बस लिख दिए थे मैंने भारी मन से

विचारो को आकर दे कर
उकेरे कागज़ पर कुछ शब्द
शब्द, जिनका कुछ महत्त्व नहीं था
बस लिख दिए थे मैंने भारी मन से

शब्द शब्द मिलकर वाक्य तो बने
पर वे वाक्य सम्पूर्ण अर्थ लिए नहीं थे
इसीलिए उन्हें मिटा कर फिर लिखना चाहा
पर लिखा गया वो ही जो पहले लिखा था
शब्द जिनका अब कुछ महत्त्व नहीं था
बस लिख दिया था मैंने भारी मन से

वो शब्द हैं सचाई इमानदारी भाईचारा दोस्ती...
और न जाने कितने ही ऐसे ही शब्द ....
जिनकी कीमत अब कोई पहचानता नहीं
शब्द जिनका अब कुछ महत्त्व नहीं था
बस लिख दिया था मैंने भारी मन से 

Wednesday, April 27, 2011

कब्र पर दिया

लिख कर तेरा नाम मिटा देता हूँ मैं 
खुद को किस बात की सजा देता हूँ मैं 

सबब आसुओ का कोई पूछे जो मुझसे 
हंस कर तेरा नाम बता देता हूँ मैं 

सजाता हूँ फूल रोज अपने कमरे में 
जाने क्यों फिर उन्हें  हटा देता हूँ मैं 

डरती हूँ अँधेरे से "कँवल" उसने कहा था 
कब्र पर उसकी एक दिया जला देता हूँ मैं 


अरविन्द मिश्र "कँवल"