Saturday, March 16, 2013

बूढी मेहरीन


खेतों की पगडण्डी का उबड़ खाबड़ रास्ता
हज़ार बार गुजरने के बाद भी
उस रास्ते पे लडखडाती चलती गाँव की सबसे बूढी महरीन
मानो यूँ लग रही थी जैसे कोई नन्ही सी लड़की
रस्सी पे खेला दिखा रही हो

गॉंव के उत्तर में उस पोखरा के पास वाले बगिया में
जहाँ कोई भी जाने से डरता हैं
ये बूढी मेहरीन चली जाती हैं रोज
उस बगिया में
जहाँ से चुन लाती हैं झाउवा भर के सूखे आम के पत्ते
और रोज सांझ को
जला उठती हैं भार....
गॉंव के नन्हे नन्हे बच्चे हाथ में मौनी लिए
चले आते हैं उस महरीन के पास ....
दाना भुझाने

वृद्ध महरीन जिसका पूरा परिवार चला गया था शहर
और छोड़ गया था उसे अकेली
मर मर के जीने को

"तुम"





कुछ लिखने की चाहत लिए जब भी उठता हूँ कलम कागज 
सारे शब्द  खो जाते हैं शून्य में,
हाथ रुक जाते हैं 
खोजने को मन की गहरे में छुपे हुवे भाव को 
जिसे आकर दे सकूँ 
जिस में तुम समां सको 
जिस में तुम्हारे होने को साकार रूप दे सकूँ 

कुछ देर बाद उंगलिया स्वयं उकेरने लगती हैं एक शब्द 
"तुम" 
और एक साकार रूप जीवित हो उठता हैं 
मुस्कुराता हुआ... शर्माता हुआ 

.....अरविन्द.....