Friday, June 10, 2011

उसकी याद रात भर सताती रही
दिल में जज्बातों की लहरे आती रही 


अब बाबस्ता हो गए हैं अंधेरो  से भी 
चाँद की चांदनी भी तो दिल जलाती रही 


कोई रहता नहीं उसके  साथ इसलिए  
वो बुढ़िया दीवारों से उमरभर बतियाती रही 


टुटा घर फटे कपडे खाने को दाना नहीं 
जिंदगी गरीब पर कोड़े बरसाती रही 


हर एक मुकाम पर रूककर देखा "कँवल"
मंजिले  हसरत आवाज दे दे कर बुलाती रही 
अरविन्द मिश्र "कँवल" 

1 comment:

anuj said...

bhtttt hi khub