Thursday, September 9, 2010

क्योकि मैं बेरोजगार जो था

आज दिल कुछ परेशां सा था.
क्योकि मैं बेरोजगार जो था

वो दोस्त जो कहते थे रहेगे साथ सदा
अब वो भी कतराने लगे हैं
मुझे देखकर अपना रास्ता बदलकर
छुप जाने लगे हैं
उन सब के लिए अब मैं बेकार जो था
क्योकि मैं बेरोजगार जो था ........

घर में जो आता हूँ दिल डरता रहता हैं
माँ बाप से नज़र कैसे मिलुगा सोचता रहता हूँ
मुह से कुछ कहते नहीं मगर आँखे पूछती हैं
आज मिली होगी नौकरी सोचती हैं
मुझे परेशां देखकर परेशां होते हैं
उनका अपना था मैं प्यार जो था
क्योकि मैं बेरोजगार जो था ..........

कमरे की दीवारे मुझसे कहती हैं
क्यों उदास पड़ा है बाहर निकल
देख दुनिया बहुत बड़ी हैं
अपने पर भरोसा रख
तेरी जरुरत कहीं पर किसी को बड़ी हैं
फिर उठा लेता हूँ फाइल
चंद रुपये, जो माँ ने राशन के लिए बचा के रखे थे
और निकल पड़ता हूँ फिर दिन भर के लम्बे सफ़र पर
अपनी किस्मत को आजमाने
क्योकि मुझे अपनी किस्मत एतबार जो था
क्योकि मैं बेरोजगार जो था

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