Saturday, September 18, 2010

एक दिन एक गाँव

भारत में शहर और गाँव दोनों अपना अपना महत्त्व रखते हैं . शहर अपनी भव्यता के लिए और गाँव अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं . जहाँ शहरों में अपनत्व ख़त्म होता जा रहा हैं वहां गाँव आज भी अपनी महेमान नवाजी की परंपरा बनाये रखे हैं ....


एक ऐसे ही गाँव में मैंने एक दिन गुजारा. पुणे से ३० किमी दूर उरली कांचन क़स्बा पड़ता हैं . उरली से ५ किमी दुरी पर हैं एक गाँव शिन्द वणे. शिन्द वणे में एक दिन कैसा था . यही कहानी लेके आया हूँ .
सबसे पहली बात वह जाने का कार्यक्रम बना कैसे . मेरे मामाजी के ऑफिस का ऑफिसबॉय गणेश . उसकी वजह से वहां जाने का मौका मिला . गणेश का गाँव "शिन्द वणे " . उसके गाँव में उर्स (मेला) था .उसके कारन उसने ऑफिस २ दिन की छुट्टी ली थी . और उसने मामाजी से मुझे अपने गाँव साथ में भेजने को मना लिया .


सन्डे १६ अप्रैल, २००६


गणेश २:३० दोपहर में लेने आया . मैं और शिंतू (मौसेरा भाई ) दोनों ही जाने के लिए बैठे थे. घर से उरली कांचन की यात्रा पुणे की सिटी बस से की . उरली कांचन पहुँच कर थोडा बहुत नाश्ता किया . वहां से आगे की यात्रा हमको जीप से करनी थी . ६:०० शाम तक हम गाँव पहुंचे . शिन्द वने में गणेश के गार जा कर थोड़ी देर आराम किया ..उसके बाद गाँव देखने निकले.
पूरा गाँव उरली ससवाद रोड पर बसा हैं . गाँव के दक्षिण दिशा में बड़े विशाल पहाड़ थे . जहा भी देखो कोई न कोई छोटा बड़ा पहाड़ दिखाई दे जाता था . शाम हो चली थी और मस्त हवा भी बहाने लगी थी .
घर पहुँच कर गणेश की माता जी से मुलाकात हुई . लेकिन माता जी हिंदी नहीं बोल पाती थी. केवल मराठी ही आती थी. गणेश को माता जी ने कुछ काम करने को कहा .तक तक हम दोनों भाइयो ने आराम किया .
९:30 बजे हम ने खाना खाया . थोडा आराम करने के बाद हम वहां चल दिए जहाँ उर्स लगा था. ........




वहां  एक stage लगा था उस पर गाँव के कुछ महत्वपूर्ण  व्यक्ति बैठे थे . stage के आगे काफी जगह खली राखी गई थी. एक तरफ महिलाये तो दूसरी तरफ पुरुष बैठे थे हमने भी जगह ले ली. 
कार्यक्रम शुरू हुआ. वहां अलग अलग ग्रुप में लड़के प्रोग्राम देने लगे. कुछ कुछ पीटी जैसा ही क़र रहे थे. ढोल नगारे झाझर से वहां का वातावरण गूंजने लगा. मुझे उनका कार्यक्रम बहुत अच्छा  लगा . वे ग्रुप अलग अलग गाँवों से थे . जैसे ही वे अपना प्रोग्राम देते जाते लोग stage पर माइक लिए  व्यक्ति को अपनी इक्छा  अनुसार रुपये दे जाते . और वो माइक वाला व्यक्ति रुपये देने वाले सज्जन का नाम बोलता. जैसे ही एक ग्रुप का कार्यक्रम ख़त्म होता...वह व्यक्ति इकठ्ठे हुवे रुपये और एक नारियल उनके ग्रुप लीडर को देता और लीडर के माथे पर गुलाल लगा देता  ..इसी प्रकार सब ग्रुप अपना कार्यक्रम देते और इनाम लेके जाते . अंत के २ ग्रुप उसी गाँव के लडको के थे एक ग्रुप में बड़े लड़के और दुसरे ग्रुप में छोटे बच्चे जो प्रिमरी स्कूल के थे. 
बड़े लडको का प्रोग्राम बहुत  अच्छा था . लडको ने काफी महेनत की थी . काफी देर तक अपनी performance देते रहे  .  इस ग्रुप को १५०० रुपये मिले . फिर छोटे बच्चो की बारी आई. अभी बच्चो ने कार्यक्रम शुरू ही नहीं किया था के लोगो ने रुपये जमा कराना  शुरू क़र दिया. पुरे ४००० रुपये जमा हुवे . १०० रुपये से नीचे किसी भी व्यक्ति ने नहीं दिया. लोगों ने दिल खोल क़र चंदा दिया . कारण था वो स्कूल primary  था . उस स्कूल को मान्यता प्राप्त  नहीं था , गाँव के लोग ही उस स्कूल को चलते थे . जितने रुपये जमा हुवे थे स्कूल के विकास में लगाया जायेगा .
इसके बाद stage खाली क़र दिया गया क्युकी अब वहां एक नाटिका, जिसे भारुड कहा जाता हैं , की त्यारिया होने लगी. पूरा नाटक मराठी में खेला जाने वाला था . जब तक भारुड की त्यारियां चल रही थी तब तक वहां लोगों ने भजन गाना शुरु क़र दिया . आधे घंटे  बाद भारुड शुरू हुआ . भारुड में खेला जाने वाला नाटक एक सत्य घटना पर आधारित  था .सतारा जिले में घटित यह घटना एक प्रेम कहानी थी . हालाकि नाटक पूरी रात चलने वाला था पर हमने १० मिनिट ही देखा और वापिश आ गए . 
गणेश ने हमारे सोने की व्यवस्था एक फार्म हाउस पर की . फार्म हाउस गणेश के घर से १ किमी दूर था हम वह पैदल ही गए .रात का समय था तो ठीक से कुछ दिखा नहीं .पर एक बात याद हिं काफी अच्छी हवा बह रही थी ......उस ठंडी  ठंडी हवा में कब नींद आ गई पता नहीं चला. अगले दिन सुबह जल्दी ही पुणे के लिए रवाना हो गए...

आज भी वो मेला याद आ जाता हैं ...गणेश की माता जी ने जो पकवान बनाये थे उन की खुसबू याद आ जाती हैं वो कार्यक्रम  याद आ जाता हैं ..भारुड याद आ जाता हैं .. फार्म हाउस की ठंडी ठंडी हवा याद आ जाती हैं ......... 

3 comments:

ओशो रजनीश said...

बढ़िया ...

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(आप क्या चाहते है - गोल्ड मेडल या ज्ञान ? )
http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_16.html

ALOK KHARE said...

achha aalkeh,
sahi kha city or vilalge jameen aasman ka fark

aaj bhi gaon wo sabb parmapara ka nirvah kar rahe hain, jo hum city ke log nhi karte

VIJAY KUMAR VERMA said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति