Thursday, October 18, 2012

तो अच्छा लगता हैं

वो जब मुझे देख मुस्कुराए तो अच्छा लगता हैं 
वो बिन बात खिलखिलाए तो अच्छा लगता हैं 

अच्छी लगती  हैं उसके मेंहदी लगे हाथों की खुशबू 
वो अपने माथे पे बिंदिया सजाये तो अच्छा लगता हैं 

यूँ तो बिन श्रृंगार किये रूप की गागर हैं वो 
कर श्रृगार रूप और निखर जाये तो अच्छा लगता हैं 

हजारो होगी रूपवती पर उसके जैसी और कहाँ 
बाहों में आये और  धड़क जाये तो अच्छा लगता हैं 

पहले मिलन की यादें अक्सर दिल को बहकाती  हैं 
हर रात पहला मिलन सा  बन जाए तो अच्छा लगता हैं 

1 comment:

कमलेश खान सिंह डिसूजा said...

बहुत ही सुन्दर शब्द रचना !!!