Saturday, March 20, 2010

मेरी DIARY के पन्ने PART 4

FRIDAY SEPT. 16, 2005

सोनू ११ बजे कोचिंग से आया । तब हमने संगम जाने का PROGRAMME बनाया। दोपहर में आराम करने के बाद हम घूमने निकले। रुक रुक कर हल्की हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। सोनू का ममेरा भई नीरज वाही कुछ दूर पर कमरा ले कर रहता था। वो B.SC. कर रहा था। हम उससे मिलने गए। १५-२० मिनिट रूककर हम संगम देखने के लिए चल दिए। वहां से संगम काफी दूर पर था, इसीलिए हमने वहां जाने के लिए साइकिल नीरज से ले ली।

लगभग १/२ घंटे बाद हम संगम के किरणे पहुच गए। जैसे ही हम वहां पहुचे बारिश शुरू हो गई । बारिश के तेज होने से पहले हमने वाही पास में एक मंदिर में शरण ली। लगभग १५ मिनिट बाद बारिश बंद हो गई।

बारिश के बंद होते ही हम उस प्रसिद मंदिर की तरफ चल दिए । उस मंदिर का मान "बड़े हुनमान जी" हैं। उस मंदिर की इन्टरनेट वेबसाइट भी है ये जान कर बहुत अच्छा लगा। वेबसाइट हैं.......... http://www.badehanumanjee.com/

उस समय हनुमान बाबा के दर्शन नहीं कर सकते थे। क्युकिं दोपहर २ बजे बाबा का श्रृंगार किया जाता हैं । इसी कारन दर्शनाथियों को अनदार दर्शन के जाने पर मनाही थी। जब हम पहुचे बाबा का श्रृंगार किया जा चूका था। आरती की तयारी शुरू की जा रही थी, शायाद ५ बजने वाले थे। हमने बहार का मौसम देखा । बारिश फिर से शुरू हो गई । हमने मंदिर में बने बरामदे में ही खड़े रहना ठीक समझा । लगभग ५ मिनिट बाद वहां के एक पुजारी जी से हमने पूछा के आरती कब शुरू होगी । तब उन्होंने बताया के अभी उसकी ही तयारी शुरू की जा चुकी हैं।

कुछ देर बाद कुछ और पुजारी आये। उन्होंने वहां से सामान हटाना शुरू कर दिया । आरती की थाल बाबा के आगे रख दी गई। फिर एक बड़े पुजारी जी आये , उन्होंने आरती शुरू कर दी।

आरती शुरू होते ही वहां अच्छी खासी भीड़ हो गई। आरती लगभग १०-१५ मिनिट तक जरी थी। उस समय ऐसा लग रहा था। जैसे आरती में सभी भगत जन कहीं खो गए । एक पुजारी ने एक बहुत बड़ा नगाड़ा बजा रहा था। सभी भगत जन वहां लगी घंटियों को बजा रहे थे। कुछ भगत जन ताली बजा कर बाबा का नाम सुमिरन कर रहे थे। कुछ भगत जन आँखे बंद कर ध्यान मगन थे। मेरे हाथ कब जुड़ गए मुझे पता नहीं चला।

बाबा की आरती करने के बाद पुजारी बाहर की तरफ आने लगे। तब ही दुसरे पुजारी ने बीच में खड़े लोगो को हट जाने का इशारा किया। तब लोगो ने बीच में एक रास्ता बना दिया। वह पुजारी वहां से निकल कर मंदिर के द्वार पर बने एक स्तम्भ की आरती करने लगा। साथ ही में वहां से कुछ दूर पर नज़र आ रही गंगा माँ की आरती भी कर रहा था।

आरती समाप्त हुई । अब सभी को अंदर जाने की आनुमति दे दी गई। अंदर पहुचने पर बाबा की आद्भुत स्वरुप के दर्शन हुवे । अकसर मंदिरों में बाबा की कड़ी प्रतिमा देखने को मिलती हैं। शायद भारत में यह आकेला मंदिर हैं जहाँ बाबा की प्रीतम भूमि पर हैं।

हनुमान जी की प्रतिमा जमीन पर थी। उसके आस पास एक फुटपाथ बना था, जहाँ खड़े हो कर बाबा के दर्शन कर सकते हैं। वहां के पुजारी प्रतिमा के पास खड़े थे।

हनुमान बाबा का श्रृंगार बहुत सुन्दर किया हुआ था। बाबा की प्रतिमा के काँधे के पास RAAMJI LAXMAAN की छोटी छोटी प्रतिमा थी। दोनों को पीले वस्त्र पहनाये गए । बाबा के पाँव के पास अहिरावन की मूर्ति थी। सभी के मुकुट चांदी के बने हुवे थे। बाबा का श्रृंगार तुलसी के पत्तो से किया हुआ था। हमको प्रसाद के रूप में वाही तुलसी के पाटते दिए गए ।हम दर्शन कर के बहार आये तो सोने ने बताया की हर साल सावां के महीने में जब बारिश में गंगा जी का पानी बाद जाता हैं तब गंगा का पानी इस मंदिर तक चला आता हैं। और तब तक पानी कम नहीं होता जब तक की बाबा की प्रतिमा तक न पहुच जाये। हालिकं मुझे इस बात को स्वविकार करने में मुश्किल हो रही थी, पर बाद में नानी ने जब बताया तब यकीं हो गया।
हमने एक व्यक्ति से उस स्थान का पता पूछा जहाँ गंगा यमुना का संगम स्थल था। हम उस स्थल की तरफ चल दिए।
थोड़ी देर बाद हम संगम स्थल पर थे। पक्की सड़क थोड़ी दूर तक ही आकर ख़त्म हो गई थी। आगे कच्छा रास्ता था, जो बारिश होने की वजह से किछाद भरे रस्ते में बदल चूका था। बच बचा कर संगम स्थल तक पहुचे । दूर तक नदी ही दिखाई दे रही थी । एक तरफ से गंगा ,दूसरी तरफ से यमुना आ कर मिल गई थी। दोनों के मिलन स्थल को ही संगम कहते हैं। इस संगम पर हिन्दू धर्म में स्नान करने का बड़ा महत्व हैं । नदी में KAFI नावे भी थी। और उस नावो पर कई लोग भी बैठे थे।
नदी में कई लोग स्नान भी कर रहे थे। हमने भी स्नान करने का मन हुआ परन्तु उचित कपडे न होने की वजह से हमने याह विचार छोड़ दिया। वाही आधा घंटा रुक कर NADIYO की हलचल देखने लगे।
दो नदियाँ परन्तु दोनों ही अलग अलग स्वभाव की। जहाँ गंगा का पानी तेज़ भाहाव में था, वहीँ यमुना के पानी की रफ़्तार कम थी।
वहीँ से लगभग २ -३किलोमीटर दूर एक पुल नज़र आ रहा था, यमुना पर बना था। यह पुल केवल दो बड़े खम्बो पर टिका था और लगभग १०४ तारो से बाधा था। मन तो उस पुल को समीप से देखने को कर रहा था। परन्तु अंधेरा होने लगा था तो हमने लौट जाना ही उचित समझा।
७ बजे हम राम प्रिय चल दिए...................

2 comments:

kshama said...

Yahan to khazana hai..!
Aaj kuchh padha kal aur lutf uthaya jayega!
'simte lamhen'pe commentke liye bahut,bahut shukriya..mera naam 'karishma' nahi 'kshama" hai!

लता 'हया' said...

शुक्रिया
आपकी diary पढ़ी ,जहाँ भी जाओ मेरा गालियों वाला सन्देश देते चलो ;कम से कम सोनू तो समझ ही जायेगा .